
बाल बिखराए हुए, चाँद का आइना लिए
झील में पाँव हिलाती रही गोरी लड़की
नीले पर्वत की तलहटी के अकेलेपन में
डुबकियाँ लेके नहाती रही गोरी लड़की
कारवां चल दिया मैदान के तम्बू उखड़े
साँझ औझल हुई सूरज की लुकाटी पकड़े
अलविदा कहते हुए आँखों में आँसू भर कर
शाख पीपल की झुकाती रही गोरी लड़की
पीले मुरझाए जटाजूटों को छितराए हुए
गाँव के बूढ़े नजूमी सा लबादा ओढ़े
पेड़ बरगद का खड़ा उसकी हथेली पकड़े
रातभर हाथ दिखाती रही गोरी लड़की
कोई भी नाव नहीं कोई शिकारा भी नहीं
रातरानी से महकती हुई धारा भी नहीं
अपने चाँदी से चमकते हुए नाखूनों से
साज लहरों का बजाती रही गोरी लड़की
मुस्कुराता हुआ बेफिक्र सा अल्हड़ बाँका
पेड़ के पीछे से इक छोकरा बादल झाँका
शर्म से लाल हुए अपने धुले चेहरे को
दोनों हाथों से छिपाती रही गोरी लड़की।
4 comments:
Hello, can you tell me who is the author of these lines, I had heard it on a TV kavi sammelan 34 years ago. If you are the author, I would like to read more of your poetry. Shall be grateful for a reply on nkaggarwal2005 at gmail dot com.
Thanks and regards
I am the author of this geet 'Chandni'. I recited it in Delhi Doordarshan Kavi Sammelan some 34 years ago. My pseudo name is Kumar Shiv. I salute your memory.
Thanks for Calling
--Kumar Shiv
इतने बरसों बाद इस गीत को तरन्नुम में पढ़ कर अच्छा लगा। मुझे ताज्जुब हुआ कि मुझे आज तक इस की वो धुन याद है जिस में आप इसे सुनाते थे।
पर इस ब्लाग पर इस गीत के बाद कोई और रचना प्रस्तुत नहीं की गई।
यह बहुत खूबसूरत है. पापा गुनगुनाते थे 1978-82 के बीच में.
टू इन वन पर ऑडियो कैसेट पर कई बार सुना.
छोटी उम्र थी तो बोल तो बोल और धुन तो कुछ आज तक याद रहे लेकिन ढूँढता रहा.
आज ये खोज भी पूरी हुई.
धन्यवाद.
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